वो जिसकी कमी है !
कुछ ऐसा महसूस होता है जैसे कि कुछ कम सा है. हर पल, हर लम्हा। ऐसा लगता है जैसे कि मैं अकेला हूँ; किसी कि तलाश है और वो मिल नही रहा। हर जगह, हर पल मैं उसे ही ढुढता रह्ता हूँ। जहाँ जाता हूँ , लगता है , काश वो यहाँ मिल जाए। हर अन्जान चेहरे मे उसे पहचानाने कि कोशिश करता हूँ। लेकिन वो मिलती ही नहीं।कई बार मैं स्वयं किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता हूँ कि मुझे ऐसे अकेलेपन का एहसास क्यों ही होता है? इतने सारे लोग है आस पास; मेरे साथ हैं ; माँ , पापा , भाई , बहन , रिश्तेदार ,दोस्त, सहकर्मी। फिर भी ऐसा क्यों लगता है कि कुछ कम है ? बस वो नहीं है जिसकी कमी है।
जाने कितने दिनों से उसे ढुढ रहा हूँ , मुझे स्वयं नहीं पता। शायद, जब से होश सम्भाला है, तबसे। तबसे तलाश है भगवान के उस आशीर्वाद की , खुदा कि उस नियामत की , जो कि मेरा अभिन्न हिस्सा बन सके। कभी ऐसा एहसास होता है कि जैसे वो शायद कभी मेरे जीवन मे आई थी , परन्तु मुझसे पहचानने मे चूक हो गई। शायद मैं उसे पहचान नहीं पाया या फिर जब कभी वो मेरे सामने थी वो समय का प्रसंग नहीं था।
समय व उम्र के साथ मेरी अपेक्षाएं भी बढ़ गयीं हैं। मुझे कोई भी ऐसॆ ही निरुद्देश्य पसंद नहीं आए; बचपन की बात कुछ अलग थी। किसी ऐसे की तलाश है जो हर पल के लिए अभिन्न हो ; ऐसा जिसकी पसंद मैं हूँ। वो मुझे पसन्द करे एक व्यक्तित्व की तरह। एसा कुछ कि मैं उस पर आँख मुन्द कर भरोसा कर सकूँ ; ऐसा कि उसे मैं वो भावनायें बेबाक् व्यक्त कर सकूँ जो उसके लिए इतने वर्षो से अपने हृदय मे छिपा कर रखा है। ऐसा कि यदि मैं अपनी जज्बातों को अनियन्त्रित छोड़ दूँ तो उसके जज्बातों मे तल्लीन हो जाएँ, सब कुछ उसे सौंप दूँ और मुझे एक बार तनिक भी संकोच ना हो ।
इतने दिनों से उसे हर पल , हर जगह , हर चेहेरे मे खोजता रहा हूँ। एक बार को ये लगता है कि कहीं वो है भी या नहीं? या कहीं दूर है वो , और मैं गलत स्थान पर खोज रहा हूँ। पता नहीं ये खोज कब खत्म होगी; कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है जैसे मैं थक गया हूँ , और कितना खोजुं ;अब बहुत हो गया। परन्तु मेरी प्रवृत्ति ऐसी नहीं है शायद ; शायद मैं यूँ हीं बैठ के ना ही हार मान सकता हूँ ; ना ही समय के बहाव के साथ बह सकता हूँ।
शायद इसिलिए एक बार मैं फ़िर उठ खड़ा होता हूँ , इस उम्मीद मे कि कहीं किसी मोड़ पर एक दिन एक मुस्कराता चेहरा मुझे मिल जाएगा और बोलेगा "सबके बीच किसे खोज रहे थे ? मैं यहाँ तुम्हारा इन्तजार कर रही थी। चलो मेरा हाथ थामो। "
मैं एक बार फ़िर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता हूँ , कि मैं उसका जल्दी से हाथ थाम लूँ या उसे पहले गले लगा लूँ।
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